मंथन- A Review

सफलता उसके पास आती है, जो साहस के साथ कार्य करते हैं। लेकिन जो परिणामों पर विचार करके ही भयभीत रहते हैं उनके पास कम आती है।

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ख़ास महिला चुनावी सभा

Posted On: 15 Oct, 2014 Others में

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http://www.explorerut.com/blog/चुनावी-सभा-भाग-एक-से-चार/
चुनावी सभा
भाग एक
अजी, चौंकिए मत| हम इस चुनाव सभा में हम आपसे कोई वोट नहीं मांग रहे| हमारी सभा कुछ मांगने वालों में से नहीं बल्कि कुछ देने वालों में से है| अब देखिये न आपके शहर में कई रैलियां हो चुकी हैं|सभी राजनीतिक दलों के उम्म्मीदवार अपने अपने कटोरों को कई कई रंगों, सॉरी-सॉरी, रंगों नहीं वादों से सजा कर आपके सामने फैलाते हैं कि आप अपना वोट उनके कटोरे में डालें| सभी नेताओं के भाषण हम पर पूरी तरह से असर भी कर जाते हैं| दिल चाहता है कि हर एक नेता को अपना वोट दे दें| इन बेचारे नेताओं को देखो मांगते भी हैं तो सिर्फ एक वोट| पर क्या करें? हमारे पास सिर्फ एक वोट क्यों होता है? चुनाव आयोग कितना कंजूस मक्खी-चूस है जो सभी को केवल एक ही वोट का अधिकार देता है| काश हमारे पास ढेर सरे वोट होते तो सभी उम्मीदवारों को कम से कम एक एक वोट तो मिल ही जाता| हम वादा करते हैं अगर कभी हमें सत्ता में आने का मौका मिला तो सभी वोटर जितने चाहें अपनी मर्जी से दिल खोलकर वोट दे सकेंगें| हम अपने देश के कानूनों का पुनर्वलोकन करेंगें और ऐसी व्यवस्था करेंगें कि नेताओं के सामने वोटों का ढेर लग जायेगा| एक ऐसा जादू बनायेंगें जिससे वोट नोट में तब्दील हो जायेंगें| फिर कोई कुर्सी के लिए नहीं लड़ेगा| तब, सत्ता के लिए घमासान युद्ध पर विराम लग जायेगा क्योंकि हम यही शांति ही तो चाहते हैं|
अच्छा तो बात चल रही थी चुनावी सभा की| हम आपको बता दें कि यह कोई चुनाव प्रचार सभा नहीं है बल्कि चुनाव जागरूकता सभा है| यह सभा इसलिए भी ख़ास है क्योंकि इसमें केवल पत्नियों को न्योता दिया गया है| अब तक तो पत्नियाँ पति के कहने पर ही वोट देती रही हैं| उन बेचारियों को तो पता भी नहीं होता उनका चुनावी हल्का कौन सा है| या, वहाँ से कौन कौन से प्रत्याशी मैदान में हैं? उन प्रत्याशियों या उनकी राजनीतिक पार्टी के बारे में जानने का हक़ तो केवल उनके पतियों को ही होता है| और, हो भी क्यों न? पति भी बेचारे सारे हक थोड़े ही रखते हैं| आज रसोई में कौन सी दाल बनेगी? खीर बनेगी? या फिर रूखी रोटी खानी पड़ेगी? छाछ पीने को मिलेगी या उसकी कढ़ी बना दी जाएगी? ये सभी हक तो केवल पत्नियों के पास ही हैं न! पतियों को जैसा भी खाना परोस दो, अगर वे चुपचाप खा लेते हैं तो फिर पत्नियाँ भी पति की मर्ज़ी से अगर एक वोट दे भी देती हैं तो क्या हुआ?
पर, आजकल के पति बड़े नकचढ़े हो गए हैं| खाना उनके स्वाद के अनुसार ही बनना चाहिए| अगर कहीं कोई छोटी सी कमी भी रह गई तो पत्नियों की शामत आ जाती है| अब अगर पति अपने स्वाद का खाना खाना चाहते हैं तो क्या पत्निय अपनी पसंद के नेता को वोट नहीं दे सकती? बस यही सोचकर हमने आज की सभा में केवल पत्नियों को आमंत्रित किया है|
हाँ तो जनाब! आप हमारी सभा में तशरीफ़ नहीं ला सकते- अगर आप पति हैं तो| हम आपको कैसे इज़ाज़त दे सकते हैं? हम देख रहे हैं कि आप इस सभा में आने के लिए कितना ललचा रहे हैं| ओहो! आपकी यह उत्सुकता जायज़ भी है क्योंकि यह सभा दुनिया भर में अपनी ही तरह की सभा होने वाली है| ऐसी सभा पहले कभी भी कहीं पर भी नहीं देखी और न ही सुनी| पर इस बार आपको अपनी तीव्र इच्छा का गला घोंटना ही पड़ेगा| वैसे अगर हमने आपको यहाँ आने की इज़ाज़त दे दी तो यह सभा अनूठी न होकर आम बन जाएगी|  और, और यदि आप हमें कोई सुझाव देना चाहते हैं तो हम विचार कर सकते हैं| लेकिन सभा की गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं होगा|
चलिए आप भी तनिक विचार कर लीजिये कि कौन से ऐसे उपाय हो सकते हैं जिससे आपको प्रवेश मिल जाये और हम भी तब तक सभा के इंतजामों का मुआयना कर लेते हैं| ध्यान रहे – यह सभा सिर्फ पत्नियों के लिए है| याद आया! हमें भी एक चुनाव प्रचार रैली में जाना है| बाकि सभी दलों की रैलियों का प्रसाद तो चख चुके केवल इसी दल का प्रसाद चखना बाकि है|धन्य है चुनावी मौसम जो हमें रोज़ रोज़ अति स्वादिष्ट प्रसाद खाने को मिलता रहता है|
चुनावी सभा
भाग एक
अजी, चौंकिए मत| हम इस चुनाव सभा में हम आपसे कोई वोट नहीं मांग रहे| हमारी सभा कुछ मांगने वालों में से नहीं बल्कि कुछ देने वालों में से है| अब देखिये न आपके शहर में कई रैलियां हो चुकी हैं|सभी राजनीतिक दलों के उम्म्मीदवार अपने अपने कटोरों को कई कई रंगों, सॉरी-सॉरी, रंगों नहीं वादों से सजा कर आपके सामने फैलाते हैं कि आप अपना वोट उनके कटोरे में डालें| सभी नेताओं के भाषण हम पर पूरी तरह से असर भी कर जाते हैं| दिल चाहता है कि हर एक नेता को अपना वोट दे दें| इन बेचारे नेताओं को देखो मांगते भी हैं तो सिर्फ एक वोट| पर क्या करें? हमारे पास सिर्फ एक वोट क्यों होता है? चुनाव आयोग कितना कंजूस मक्खी-चूस है जो सभी को केवल एक ही वोट का अधिकार देता है| काश हमारे पास ढेर सरे वोट होते तो सभी उम्मीदवारों को कम से कम एक एक वोट तो मिल ही जाता| हम वादा करते हैं अगर कभी हमें सत्ता में आने का मौका मिला तो सभी वोटर जितने चाहें अपनी मर्जी से दिल खोलकर वोट दे सकेंगें| हम अपने देश के कानूनों का पुनर्वलोकन करेंगें और ऐसी व्यवस्था करेंगें कि नेताओं के सामने वोटों का ढेर लग जायेगा| एक ऐसा जादू बनायेंगें जिससे वोट नोट में तब्दील हो जायेंगें| फिर कोई कुर्सी के लिए नहीं लड़ेगा| तब, सत्ता के लिए घमासान युद्ध पर विराम लग जायेगा क्योंकि हम यही शांति ही तो चाहते हैं|
अच्छा तो बात चल रही थी चुनावी सभा की| हम आपको बता दें कि यह कोई चुनाव प्रचार सभा नहीं है बल्कि चुनाव जागरूकता सभा है| यह सभा इसलिए भी ख़ास है क्योंकि इसमें केवल पत्नियों को न्योता दिया गया है| अब तक तो पत्नियाँ पति के कहने पर ही वोट देती रही हैं| उन बेचारियों को तो पता भी नहीं होता उनका चुनावी हल्का कौन सा है| या, वहाँ से कौन कौन से प्रत्याशी मैदान में हैं? उन प्रत्याशियों या उनकी राजनीतिक पार्टी के बारे में जानने का हक़ तो केवल उनके पतियों को ही होता है| और, हो भी क्यों न? पति भी बेचारे सारे हक थोड़े ही रखते हैं| आज रसोई में कौन सी दाल बनेगी? खीर बनेगी? या फिर रूखी रोटी खानी पड़ेगी? छाछ पीने को मिलेगी या उसकी कढ़ी बना दी जाएगी? ये सभी हक तो केवल पत्नियों के पास ही हैं न! पतियों को जैसा भी खाना परोस दो, अगर वे चुपचाप खा लेते हैं तो फिर पत्नियाँ भी पति की मर्ज़ी से अगर एक वोट दे भी देती हैं तो क्या हुआ?
पर, आजकल के पति बड़े नकचढ़े हो गए हैं| खाना उनके स्वाद के अनुसार ही बनना चाहिए| अगर कहीं कोई छोटी सी कमी भी रह गई तो पत्नियों की शामत आ जाती है| अब अगर पति अपने स्वाद का खाना खाना चाहते हैं तो क्या पत्निय अपनी पसंद के नेता को वोट नहीं दे सकती? बस यही सोचकर हमने आज की सभा में केवल पत्नियों को आमंत्रित किया है|
हाँ तो जनाब! आप हमारी सभा में तशरीफ़ नहीं ला सकते- अगर आप पति हैं तो| हम आपको कैसे इज़ाज़त दे सकते हैं? हम देख रहे हैं कि आप इस सभा में आने के लिए कितना ललचा रहे हैं| ओहो! आपकी यह उत्सुकता जायज़ भी है क्योंकि यह सभा दुनिया भर में अपनी ही तरह की सभा होने वाली है| ऐसी सभा पहले कभी भी कहीं पर भी नहीं देखी और न ही सुनी| पर इस बार आपको अपनी तीव्र इच्छा का गला घोंटना ही पड़ेगा| वैसे अगर हमने आपको यहाँ आने की इज़ाज़त दे दी तो यह सभा अनूठी न होकर आम बन जाएगी|  और, और यदि आप हमें कोई सुझाव देना चाहते हैं तो हम विचार कर सकते हैं| लेकिन सभा की गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं होगा|
चलिए आप भी तनिक विचार कर लीजिये कि कौन से ऐसे उपाय हो सकते हैं जिससे आपको प्रवेश मिल जाये और हम भी तब तक सभा के इंतजामों का मुआयना कर लेते हैं| ध्यान रहे – यह सभा सिर्फ पत्नियों के लिए है| याद आया! हमें भी एक चुनाव प्रचार रैली में जाना है| बाकि सभी दलों की रैलियों का प्रसाद तो चख चुके केवल इसी दल का प्रसाद चखना बाकि है|धन्य है चुनावी मौसम जो हमें रोज़ रोज़ अति स्वादिष्ट प्रसाद खाने को मिलता रहता है|

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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sadguruji के द्वारा
October 17, 2014

अच्छा लेख ! इसमें व्यंग्य का रंग भी है ! भाग दो की प्रतीक्षा रहेगी ! बधाई और दिवाली की शुभकामनाएं-sadguruji


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