मंथन- A Review

सफलता उसके पास आती है, जो साहस के साथ कार्य करते हैं। लेकिन जो परिणामों पर विचार करके ही भयभीत रहते हैं उनके पास कम आती है।

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'उत्सव' ने तो अरमान दिल के सजा रखे हैं| Contest

Posted On: 11 Sep, 2013 Contest में

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चिराग 2‘हिंदी बाज़ार की भाषा है गर्व की नहीं’ या ‘हिंदी गरीबों, अनपढ़ों की भाषा बन कर रह गयी है’ – क्या कहना है आपका?

जो बिका वही सिकंदर!

हर तरफ बाज़ार की धूम है| जिसकी मांग अधिक उसी का मूल्य अधिक| जिसकी चर्चा अधिक उसी की मांग अधिक| जिसका प्रचार अधिक उसी की चर्चा अधिक| मगर प्रचार एक ऐसी प्रक्रिया है जो इच्छा शक्ति से उत्पन्न होती है इसलिए जिसके लिए इच्छा शक्ति अधिक उसी का प्रचार अधिक| यहाँ हम यह नहीं कह सकते कि जिसमें दम अधिक उसी का प्रचार अधिक| क्योंकि बहुत सी ऐसी उच्च गुणवत्ता वाली वस्तुएँ या सेवाएँ या कोई भी कार्य उस स्तर तक सर्वप्रिय नहीं बन सकते जितना उनमें दम होता है|

इस मामले में स्वामी विवेकानंद जी के योगदान को जितना प्रचारित किया जाये उतना कम है| उन्होंने विश्व के इतिहास में अमेरिका जैसे देश की संसद में हिंदी भाषा में भाषण दिया था| विश्व पटल हिंदी पटल बनने की राह पर चल सकता था यदि उस गौरवान्वित करने वाली घटना तो भुनाया जाता| पर, अफ़सोस की बात है कि भाषा के तथाकथित ठेकेदार अंग्रेजी में लिखने को अधिक तरजीह देने लगे| उनके विचार अंग्रेजी भाषा में बिकने लगे तो हिंदी भाषा से मोह भी समाप्त होने लगा|

इससे बड़ी विडंबना तो येह है कि फिर वही विचार व साहित्य जो मूलतः भारतीय लेखकों द्वारा अंग्रेजी में लिखा गया, वापिस हिंदी में अनुवादित हो कर हिंदुस्तान में बिकने लगे| अब सवाल उठता है कि ऐसी स्थिति आई ही क्यों? इसका बड़ा स्पष्ट सा तर्क है – ‘घर की मुर्गी दाल बराबर’| हिंदुस्तान में हिंदी भाषा में लिखे विचारों को जब पहचान नहीं मिली और विदेशी भाषाओँ ने उन्ही विचारों का मान व दाम दिया तो भाषा बदल गयी| वह दौर आज तक चला आ रहा है कि नामी गिरामी पत्र-पत्रिकाएँ विदेशी भाषाओँ से अनूदित रचनाओं का अधिक सम्मान करती हैं| उन्हें अधिक जगह देती हैं क्योंकि यह मान लिया गया है कि हिंदी गरीबों, अनपढ़ों की भाषा बन के रह गयी है|

वास्तविकता यह भी है कि हिंदी जानने वालो की क्रय शक्ति क्षीण होती है| एक ही लेखक की एक ही विषय वस्तु पर प्रकाशित सामग्री यदि हिंदी भाषा में है तो कम मूल्यवान तथा यदि विदेशी भाषा में है तो अधिक मूल्यवान समझा जाता है| आयातित वस्तुएं अक्सर ब्रांडेड मानी जाती हैं साथ ही यह भी सत्य है कि भारतीय सिनेमा को अंग्रेजी के पटल पर अच्छी जगह मिल चुकी है तो क्या हिंदी भाषा को उदारीकरण व वैश्वीकरण की नीति के अंतर्गत विश्वपटल पर अपना तेज लहराने में कोई दिक्कत पेश आएगी?

बहरहाल, सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए भविष्य में उम्मीद की जा सकती है कि हिंदी भाषायी लेखकों व चिंतकों की कोशिशें इस दौर को पीछे छोड़ कर हिंदी भाषा को अंतर्राष्ट्रीय भाषा का दर्जा दिलाने में अहम् भूमिका निभाएंगी|

क्योंकि…

मुंडेरों पर चिराग हमने जला रखे हैं

अंधेरों ने तूफ़ान सारे बुला रखे है|

जो जीता है वही सिकंदर इसी जहाँ का

‘उत्सव’ ने तो अरमान दिल के सजा रखे हैं| …उषा तनेजा ‘उत्सव’

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24 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

SATYA SHEEL AGRAWAL के द्वारा
September 25, 2013

उषा जी ,सुन्दर चिंतन के साथ सुन्दर ब्लॉग के लिए बधाई स्वीकारें.कभी समय मिले तो मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है

    ushataneja के द्वारा
    September 25, 2013

    आदरणीय SATYA SHEEL AGRAWAL जी, प्रोत्साहन के लिए हार्दिक धन्यवाद|

Bhagwan Babu के द्वारा
September 15, 2013

सही कह रहे है आप…

    ushataneja के द्वारा
    September 15, 2013

    प्रोत्साहन के लिए आभार Bhagwan Babu जी|

bhanuprakashsharma के द्वारा
September 15, 2013

हिंदी को न तो प्रचार की जरूरत है और न प्रसार की। हिंदी हमारे समाज की आवश्यकता है। बस आप हिंदी में लिखते जाइए। इसे पढ़ने वाले भी कम नहीं हैं। न ही हिंदी को कोई खतरा है। इसका भविष्य उज्ज्वल है। 

    ushataneja के द्वारा
    September 15, 2013

    आपका मत भी एकदम उचित है-हिंदी को न तो प्रचार की जरूरत है और न प्रसार की। हिंदी हमारे समाज की आवश्यकता है। बस आप हिंदी में लिखते जाइए। इसे पढ़ने वाले भी कम नहीं हैं। न ही हिंदी को कोई खतरा है। इसका भविष्य उज्ज्वल है, आदरणीय bhanuprakashsharma जी| हमें अपना योगदान देते रहना चाहिए| हार्दिक धन्यवाद|

udayraj के द्वारा
September 14, 2013

बात सही है और सार यही है – ‘घर की मुर्गी दाल बराबर’ । अत: सोच बदलने की आवश्याता है । दिखावा लोगों के इस तरह सर चढ के बोल रहा है की लोग अपनो का तिरस्कार करके विदेशी भाषा बोल रहे है । पर अपना अपना ही होता है और गैर, गैर ।

    ushataneja के द्वारा
    September 15, 2013

    जी हाँ बिलकुल सही कहा आपने udayraj जी| जिस तरह घर की मुर्गी भी दाल जैसी ही लगती है उसी प्रकार हिंदी भाषा में बात करना निम्न स्तर का लगता है| सोच तो हर हाल में बदलनी ही चाहिए| टिप्पणी के लिए धन्यवाद|

Mudassar Imam के द्वारा
September 14, 2013

बहुत ही बेहतरीन बातें आपने रखा आपको बधाई हो और मेरा कहना है के आखिर कब हम समझेंगे अपनी इज्ज़त अपना वेकार इतने सारे लेख काफी नहीं हम सब के अकाल से पर्दा उठाने के लिए आज भी अगर हम नहीं समझ सके तो फिर यही कहना मुनासिब होगा के ; समझ समझना भी एक समझ है समझ समझ के भी जो न समझे मेरे समझ में वो न समझ है दूसरी बात के : खुद ने आज तक उस कौम की हालत नहीं बदली : जिसको खुद ही न हो खेयाल अपने ही हालत के बदलने का बहुत अछि बात है आपको मालिक लम्बी उम्र दे के आप देश के लिए कुछ कर सकें deartellme2006@yahoo.co.in

    ushataneja के द्वारा
    September 15, 2013

    आदरणीय Mudassar Imam जी, प्रोत्साहन के लिए हार्दिक शुक्रिया!

जयप्रकाश सोमई के द्वारा
September 14, 2013

बहुत ही सुन्दर लिखा ……………

    ushataneja के द्वारा
    September 15, 2013

    हार्दिक धन्यवाद जयप्रकाश सोमई जी|

Ravindra K Kapoor के द्वारा
September 12, 2013

उषाजी आपकी बात काफी हद तक सही है पर क्या आने इस बात का प्रयास किया कि हम हिंदी प्रेमी अपनी इस भाषा को कैसे विश्व कि एक अनमोल और सबसे समृद्ध भाषा बना सकते हैं ? मेरे विचार से केवल अंग्रेजी को कोसने से हिंदी का उत्थान होना बहूत मुश्किल है. हिदी तभी आगे बढ़ सकती है जब विश्व के सभी उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी में अनुवाद करना शुरू कर हम हिंदी को विश्व के सबसे सुन्दर और एक विशाल साहित्य वाली भाषा बना सकने का कम से कम प्रयास तो शुरू करें. हम शायद तभी इस पर गर्व कर सकेंगे. सुभकामनाओं के साथ…रवीन्द्र

    ushataneja के द्वारा
    September 13, 2013

    आदरणीय Ravindra K Kapoor जी, धन्यवाद अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए. आपका सुझाव व प्रश्न ग्रहणीय है| सादर नमन!

    ushataneja के द्वारा
    September 13, 2013

    आदरणीय Ravindra K Kapoor जी, मेरे मन में एक विचार यह भी उठ रहा है कि हिन्दुस्तान के लेखक मूलतः हिंदी में लिखें व विश्व की दूसरी भाषाओं को उसका अनुवाद करने की ज़रुरत महसूस हो तो गर्व की बात होगी| आपका क्या ख्याल है?

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
September 12, 2013

अफ़सोस की बात है कि भाषा के तथाकथित ठेकेदार अंग्रेजी में लिखने को अधिक तरजीह देने लगे| उनके विचार अंग्रेजी भाषा में बिकने लगे तो हिंदी भाषा से मोह भी समाप्त होने लगा| जी आदरणीया ‘उषा उत्सव जी ..प्रचार का ज़माना है जिसमे बड़ी लाबी लगी है नेता अभिनेता लगे हैं सेल वहीं है लेकिन फिर भी हमें हताश तो नहीं होना सब मिल अपने स्तर पर यों ही लगे रहें अब विश्व में पहचान बन रही हैं हिंदी ब्लागिंग से भी बहुत कुछ बदला है शासन थोडा जागे तो बात बने सुन्दर लेख जय हिंदी जय हिन्द भ्रमर ५

    ushataneja के द्वारा
    September 12, 2013

    धन्यवाद आदरणीय भ्रमर जी| सादर नमन!

    ushataneja के द्वारा
    September 13, 2013

    आदरणीय surendra shukla bhramar5 जी, आपकी बात बिलकुल सही है| अगर हमारी सरकार भी जापान की सरकार की तरह अटल निश्चय कर ले तो सब संभव हो सकता है.

September 12, 2013

मुंडेरों पर चिराग हमने जला रखे हैं अंधेरों ने तूफ़ान सारे बुला रखे है| जो जीता है वही सिकंदर इसी जहाँ का ‘उत्सव’ ने तो अरमान दिल के सजा रखे हैं| bahut sundar bat kah gayi hain aap .aabhar

    ushataneja के द्वारा
    September 12, 2013

    आदरणीय शालिनी जी, प्रोत्साहन के लिए हार्दिक आभार!

Pradeep Kesarwani के द्वारा
September 12, 2013

दूसरी भाषाओ को जरूरत होती होगी प्रचार प्रसार की ….. जबकि हिन्दी हरमरे रोम -2 मे बसती हैं ….. सुंदर लेख और सुंदर कविता बधाई स्वीकारें …!!!

    ushataneja के द्वारा
    September 12, 2013

    जी प्रदीप केसरवानी जी, हिंदी हमारे रोम रोम में बसती है| धन्यवाद!

seemakanwal के द्वारा
September 11, 2013

हिंदी अवश्य एक दिन अपना परचम लहराएगी.. धन्यवाद सादर.

    ushataneja के द्वारा
    September 11, 2013

    जी हाँ बिलकुल सही कहा आपने seemakanwal जी, हिंदी अवश्य एक दिन अपना परचम लहराएगी.. आभार!


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