मंथन- A Review

सफलता उसके पास आती है, जो साहस के साथ कार्य करते हैं। लेकिन जो परिणामों पर विचार करके ही भयभीत रहते हैं उनके पास कम आती है।

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ushataneja


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ख़ास महिला चुनावी सभा

Posted On: 15 Oct, 2014  
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Others में

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नेता जी – हास्य कविता

Posted On: 27 May, 2014  
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Hindi Sahitya कविता हास्य व्यंग में

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दुविधा

Posted On: 8 Nov, 2013  
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Contest Junction Forum में

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हम साथ साथ हैं…

Posted On: 11 Oct, 2013  
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Contest Junction Forum social issues में

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आशा का दामन

Posted On: 8 Oct, 2013  
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Hindi Sahitya Others lifestyle social issues में

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यदि हम लीक से हट कर उस आयोजन को आयोजित करें तो… Jagran Contest

Posted On: 27 Sep, 2013  
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Contest में

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कमजोरियों तथा कमियों को छिपाने के बहाने ढूँढना

Posted On: 25 Sep, 2013  
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‘उत्सव’ ने तो अरमान दिल के सजा रखे हैं| Contest

Posted On: 11 Sep, 2013  
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के द्वारा: Bhagwan Babu Bhagwan Babu

आपने ठीक कहा है , जब तक हमारे देश के अगुआ ,लीडर ,नेता , मंत्री एवं परधान मंत्री हिंदी को जो दर्जा दिया जाना चाहिए , वह नहीं देंगे तब तक हिंदी भाषा को उचित सम्मान नहीं मिल सकेगा अतः इतना तो अनिवार्य करना ही चाहिए की जो भी लोकसभा चुनाव में जीत कर आये उसे हिंदी में बोलना लिखना आना जरूरी है जब एक किरानी की भरती के लिए एक न्यूनतम योग्यता की जरूरत है फिर देश को चलाने वाले नेता ऐसे अपवाद क्यूँ हैं? जो देश की राष्ट्रभाषा को ही नहीं जानते और ना ही उसका उपयोग करते हैं जिस लोकसभा सत्र को आज पूरा देश देखता है वहां जरूर हिंदी में ही संवाद कहना अनिवार्य होना चाहिए तभी जाकर हिंदी को उचित मान्यता पूरे देश में मिलेगी वैसे भी अंग्रेजी भाषा का ज्ञान अपने देश में १० प्रतिशत से ज्यादा लोगों को भी नहीं होगा . आपने एक प्रेरणा दायक आलेख लिखा है आपका धन्यवाद

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सुन्दर प्रस्तुति के लिए साधुवाद मेरे जिस टुकड़े को दो पल की दूरी बहुत सताती थी जीवन के चौथेपन में अब ,बह सात समन्दर पार हुआ रिश्तें नातें -प्यार की बातें , इनकी परबाह कौन करें सब कुछ पैसा ले डूबा ,अब जाने क्या व्यवहार हुआ दिल में दर्द नहीं उठता है भूख गरीबी की बातों से धर्म देखिये कर्म देखिये सब कुछ तो ब्यापार हुआ मेरे प्यारे गुलशन को न जानें किसकी नजर लगी है युवा को अब काम नहीं है बचपन अब बीमार हुआ जाने कैसे ट्रेन्ड हो गए मम्मी पापा फ्रेंड हो गए शर्म हया और लाज ना जानें आज कहाँ दो चार हुआ ताई ताऊ , दादा दादी ,मौसा मौसी दूर हुएँ अब हम दो और हमारे दो का ये कैसा परिवार हुआ मदन मोहन सक्सेना

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